संविधान की शपथ या सत्ता की वफादारी?देश में अपराध बढ़ रहे हैं,महिलाएं असुरक्षित हैं,युवा बेरोजगार हैं।

विनोद नेताम (वरिष्ठ पत्रकार) छत्तीसगढ़

विशेष रिपोर्ट_
दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें रोज आ रही हैं,लेकिन जब बात आती है विपक्षी राज्यों की
तब अचानक संवैधानिक सक्रियता तेज हो जाती है।
सवाल सीधा है।
क्या राष्ट्रपति और राजभवन संविधान के रक्षक हैं या सत्ता की राजनीति के औज़ार?
लोकतंत्र में सबसे ऊंचे पद पर बैठा व्यक्ति किसी दल का नहीं, पूरे देश का होता है।
अगर संवैधानिक संस्थाएं भी राजनीतिक इशारों पर चलने लगे,तो फिर लोकतंत्र और कठपुतली में फर्क ही क्या रह जाएगा?
संवैधानिक पदों की गरिमा पर सवाल
देश के लोकतंत्र में राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों को हमेशा निष्पक्ष और दलगत राजनीति से ऊपर माना गया है। संविधान की शपथ लेते समय यही उम्मीद की जाती है कि इन पदों पर बैठे लोग सत्ता और विपक्ष से परे रहकर केवल संविधान और देशहित को प्राथमिकता देंगे।
लेकिन पिछले लगभग एक दशक में जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। आरोप लगातार लगते रहे हैं कि केंद्र की सत्ता पर काबिज सरकार राजभवनों और संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्षी शासित राज्यों पर राजनीतिक दबाव बनाने के औज़ार के रूप में कर रही है। अगर यह धारणा मजबूत होती है, तो यह केवल किसी एक दल का नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का नुकसान है।
राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि जनता उनसे निष्पक्षता, संतुलन और नैतिक नेतृत्व की अपेक्षा करती है। राष्ट्रपति से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे किसी राजनीतिक खेमे की छाया में दिखाई दें या उनकी भूमिका को लेकर “कठपुतली” जैसी आलोचनाएँ उठें।

देश के सामने आज कई गंभीर मुद्दे हैं,महिलाओं के खिलाफ अपराध, बेरोजगारी, दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यकों से जुड़े सवाल, और संसद के भीतर तक गिरती हुई राजनीतिक भाषा। ऐसे समय में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की नैतिक जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे इन मुद्दों पर संतुलित और संवेदनशील भूमिका निभाएँ।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता और गरिमा से चलता है। अगर संवैधानिक संस्थाओं पर राजनीतिक पक्षधरता के आरोप बढ़ते हैं, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। इसलिए जरूरी है कि राष्ट्रपति भवन और राजभवन जैसे पद हमेशा निष्पक्षता, मर्यादा और संविधान की आत्मा के प्रतीक बने रहें।
क्या संवैधानिक पद भी अब राजनीति के औज़ार बन चुके हैं?
भारत का संविधान राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे पदों को इसलिए बनाता है ताकि वे सत्ता और विपक्ष के बीच एक निष्पक्ष संतुलन बने रहें। लेकिन पिछले 10–12 वर्षों में जो तस्वीर सामने आ रही है, उसने इस संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देश में लगातार यह आरोप लग रहा है कि केंद्र की सत्ता पर काबिज सरकार राजभवन और राष्ट्रपति भवन जैसे संस्थानों को विपक्षी राज्यों के खिलाफ एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। अगर लोकतंत्र की सबसे ऊंची संवैधानिक संस्थाएं भी राजनीतिक इशारों पर चलती दिखें, तो यह केवल विपक्ष की नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका सिर्फ सत्ता पक्ष के संकेतों का पालन करना रह गई है? क्या संविधान की शपथ लेने का अर्थ यही है कि लोकतंत्र की आत्मा को नजरअंदाज कर दिया जाए?
देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं, बेरोजगार युवा सड़कों पर भटक रहे हैं, दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय लगातार अन्याय की शिकायत कर रहे हैं। संसद के भीतर तक भाषा का स्तर गिर चुका है। लेकिन इन गंभीर सवालों पर संवैधानिक संस्थाओं की आवाज अक्सर खामोश दिखाई देती है।
अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल की सक्रियता केवल राजनीतिक विवादों या विपक्षी सरकारों के मामलों में ही दिखाई दे, तो स्वाभाविक है कि जनता के मन में सवाल उठेंगे।
लोकतंत्र की असली ताकत चुनाव नहीं, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता होती है। जिस दिन जनता को लगेगा कि संवैधानिक पद भी सत्ता की राजनीति के मोहरे बन चुके हैं, उसी दिन लोकतंत्र की नींव हिलने लगेगी।
इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यही है।
क्या संवैधानिक संस्थाएं सत्ता से ऊपर खड़ी रहेंगी, या सत्ता की छाया में सिमट जाएंगी?

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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