“बेशरम के दिन बौऊ गे,अऊ भरवा के दिन नंदा गे”
आधुनिकता के दौर में बदलती छत्तीसगढ़ की पहचान और परंपराएं कहीं पीछे छूटती नजर आ रही हैं।

छत्तीसगढ़/बालोद
विशेष आलेख विनोद नेताम (वरिष्ठ पत्रकार)
छत्तीसगढ़ की पावन धरती पर समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है।कभी गांव-गांव में बांसिदे लोग बेशरम और भरवा जैसे पौधों को पहचानते ही नहीं थे, बल्कि उनका जीवन इनसे जुड़ा हुआ था। पर आज हालात ऐसे हैं, कि

“बेशरम के दिन बौऊ गे, अऊ भरवा के दिन नंदा गे” कहावत सटीक बैठती नजर आ रही है।
बेशरम: नाम भले अटपटा, उपयोग बड़ा
छत्तीसगढ़ सहित मध्य भारत में पाया जाने वाला बेशरम पौधा, जिसका वैज्ञानिक नाम “इपोमोआ कार्निया” है, पहले सामान्य झाड़ियों के रूप में देखा जाता था।
पुराने समय में इसका उपयोग सीमित था, लेकिन अब अमृतकाल के इस दौर में इसकी “मांग” बढ़ गई है।
सूत्रों के अनुसार, नदी-नालों से रेत निकालने वाले कारोबार में बेशरम की लकड़ियों और झाड़ियों का इस्तेमाल अस्थायी रास्ता बनाने, किनारों को मजबूत करने या ढांकने के लिए किया जा रहा है। यही कारण है कि जो पौधा कभी बेकार समझा जाता था, उसका महत्व अचानक बढ़ गया है।
भरवा घास: संस्कृति की जड़ें हो रहीं कमजोर
वहीं दूसरी ओर,भरवा जाति की घास, जो कभी छत्तीसगढ़ी सभ्यता का अभिन्न हिस्सा थी,आज विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है।
पुराने जमाने में भरवा घास से:
झोपड़ी की छत तैयार की जाती थी
“रूंछना” बांधा जाता था
“छिपारी” बनाई जाती थी
पशुओं के चारे और घरेलू उपयोग में भी लिया जाता था
लेकिन आधुनिक पक्के मकानों और प्लास्टिक/टीन के बढ़ते इस्तेमाल ने इन पारंपरिक संसाधनों को पीछे धकेल दिया है।

बदलती जीवनशैली, मिटती पहचान
ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि पहले गांव की पहचान ही इन प्राकृतिक संसाधनों से होती थी। अब नई पीढ़ी न तो इन पौधों को पहचानती है और न ही इनके महत्व को समझती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भरवा जैसी पारंपरिक घासों के संरक्षण और संवर्धन की पहल नहीं की गई, तो आने वाले समय में ये केवल कहावतों और लोकगीतों तक सीमित रह जाएंगी।
पर्यावरणविदों की चिंता
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि एक ओर जहां बेशरम का अनियंत्रित फैलाव कई बार जल स्रोतों के लिए समस्या बनता है, वहीं भरवा जैसी उपयोगी घासों का लुप्त होना जैव विविधता के लिए खतरे की घंटी है।
छत्तीसगढ़ की मिट्टी में बसी परंपरा और प्रकृति का यह संतुलन अब बदलता दिख रहा है।
समय की मांग है कि विकास के साथ-साथ पारंपरिक संसाधनों और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी जान सकें कि “भरवा के दिन” कभी सच में कितने समृद्ध हुआ करते थे।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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