विनोद नेताम
विशेष रिपोर्ट_
दुनिया के एक बड़े और संवेदनशील घटनाक्रम पर अगर सत्ता के सबसे ऊँचे पद से सन्नाटा हो, तो सवाल उठना लाज़िमी है। जब एक ऐसे देश में बड़ा राजनीतिक झटका लगता है जिसे भारत दशकों से “रणनीतिक साझेदार” कहता रहा है, तब चुप्पी सिर्फ चुप्पी नहीं रहती  वह संदेश बन जाती है।
ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर हमले और उनके निधन की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।

लेकिन भारत की तरफ से आधिकारिक स्तर पर अब तक कोई सार्वजनिक शोक संदेश नहीं आया,कम से कम सोशल मीडिया पर तो नहीं।
और यही बात लोगों को चुभ रही है।
याद कीजिए, जब 2024 में ईरान के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हुई थी, तब भारत में एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया था। तब संवेदना थी, औपचारिकता थी, राजनायिक संतुलन था।
फिर अब यह सन्नाटा क्यों?
क्या यह बदलते वैश्विक समीकरणों का दबाव है?
क्या यह अमेरिका-इज़रायल के साथ रणनीतिक समीकरण साधने की कोशिश है?
या फिर यह सिर्फ “वक्त का इंतज़ार” है?
कूटनीति में शब्द तोलकर बोले जाते है- लेकिन कभी-कभी न बोले गए शब्द भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
युद्ध का रोमांच बनाम युद्ध की हकीकत
जो लोग दूर बैठकर युद्ध को टीवी डिबेट की तरह देखते हैं, जो सोशल मीडिया पर “सबक सिखाने” की भाषा में तालियाँ बजाते हैं – उन्हें शायद यह समझना होगा कि युद्ध कोई वीडियो गेम नहीं है।
युद्ध में मिसाइलें विचारधारा नहीं पूछतीं।
बम दोस्त और दुश्मन में फर्क नहीं करते।
आग सीमा रेखा देखकर नहीं फैलती।
तेल की कीमतें बढ़ती हैं।
रोज़गार पर असर पड़ता है।
विदेशों में फँसे नागरिकों की जिंदगी दाँव पर लगती है।
और अंत में मरता आम आदमी ही है।
भारत जैसे देश के लिए, जो ऊर्जा और रणनीतिक संतुलन दोनों में पश्चिम एशिया पर निर्भर है, ऐसी हर घटना सिर्फ “विदेशी खबर” नहीं होती,यह सीधा आर्थिक और कूटनीतिक असर डालती है।
दोस्ती, समझौते और बदलती प्राथमिकताएँ
2016 की तेहरान यात्रा के बाद चाबहार बंदरगाह समझौते को भारत-ईरान संबंधों का नया अध्याय कहा गया था। उसे “सभ्यताओं का संगम” बताया गया था।
आज हालात बदले हुए हैं,गठबंधन बदले हैं,प्राथमिकताएँ बदली हैं।
लेकिन सवाल वही है- क्या रणनीतिक साझेदारी सिर्फ सुविधानुसार याद की जाने वाली चीज़ है?
यह वक्त उत्तेजना में नारे लगाने का नहीं, बल्कि दूरदर्शिता से सोचने का है।
युद्ध की आग में घी डालने वाले अक्सर सुरक्षित कमरों में बैठे होते हैं।
जलते वे हैं जो सीमाओं के पास रहते हैं, या जिनकी रोटी-रोज़ी वैश्विक स्थिरता पर टिकी होती है।
देशभक्ति का मतलब युद्ध का उत्साह नहीं- बल्कि शांति की कीमत समझना भी है।
और शायद यही बात आज सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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