Vinod Netam
छत्तीसगढ़/विशेष रिपोर्ट _
(Chhattisgarh junction)छठ्ठी से लेकर मरनी तक जिसकी मदमस्त गंध समाज को “तरोज़ा” करने का दावा करती है, वही दारू अब होली के रंग में पूरी तरह घुल चुकी है। सवाल ये है कि इस नशे की संस्कृति को आखिर कौन रोकना चाहता है? क्योंकि अब तो “दारू बगैर सूना संसार” का नारा बेवड़ों की जुबान पर आम हो चुका है। लिहाज़ा होली आते ही बोतलों और पौवों की ठक-ठक से माहौल गूंज उठा।
छत्तीसगढ़ में होली के पहले ही दिन शराब दुकानों पर जो नज़ारा दिखा, वो किसी मेले से कम नहीं था। लंबी-लंबी कतारें, धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और कई जगहों पर हाथापाई तक की नौबत! “शोले” और “रोमियो” जैसे ब्रांडों की बोतलें ऐसे उड़ रही थीं जैसे मुफ्त में बांटी जा रही हों।
शहर हो या कस्बा, गांव हो या मोहल्ला,हर जगह एक ही चर्चा, “कितना स्टॉक बचा है?”
हैरानी की बात यह है कि जिस प्रदेश को कभी अपनी सादगी और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता था।वही आज “अमृतकाल” में बेवड़ापन की नई पहचान गढ़ता दिख रहा है। तीन करोड़ जनता वाले इस प्रदेश में सरकार खुद यह तर्क देती है कि “राज्य की आर्थिक सेहत” के लिए शराब बिक्री जरूरी है। यानी विकास का पहिया अब बोतल के ढक्कन से घूमेगा?
क्या यही मॉडल है आर्थिक मजबूती का?
क्या यही है नई पीढ़ी को दिया जाने वाला संदेश?
गांव-गांव, चौक-चौराहों और गली-मोहल्लों में होली के नाम पर जो बवाल हर साल देखने को मिलता है, वो किसी से छुपा नहीं है। घरेलू हिंसा, सड़क हादसे, झगड़े, सबका ग्राफ इन दिनों अचानक क्यों बढ़ जाता है?
लेकिन सत्ता के गलियारों में सब कुछ “राजस्व” की भाषा में नापा जाता है। जितनी ज्यादा बिक्री, उतनी ज्यादा तिजोरी भरी।
होली रंगों का त्योहार है या नशे का उत्सव?
ये सवाल अब जनता को खुद से पूछना होगा।
क्योंकि अगर “दे दारू भाई दे दारू” ही विकास का नया नारा बन गया, तो आने वाली पीढ़ी के हिस्से में रंग नहीं, सिर्फ धुआं और नशे की बदबू ही बचेगी।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

