विनोद नेताम (वरिष्ठ पत्रकार)छत्तीसगढ़
नई दिल्ली/ विशेष रिपोर्ट
देश की राजनीति में एक बार फिर संवैधानिक पदों की गरिमा और उनके राजनीतिक उपयोग को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिना लाग-लपेट के राष्ट्रपति पद को लेकर चल रही राजनीति पर ऐसा सवाल उठाया है, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है।
ममता बनर्जी ने साफ शब्दों में कहा
जब आदिवासियों पर अत्याचार होता है, तब राष्ट्रपति की संवैधानिक चिंता कहाँ चली जाती है? मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आदिवासी उत्पीड़न की खबरें आती हैं, तब विरोध की आवाज़ क्यों नहीं उठती? राष्ट्रपति पद की गरिमा को किसी पार्टी की राजनीति का औजार मत बनाइए।
उनकी यह टिप्पणी केवल एक बयान नहीं, बल्कि केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति पर सीधा हमला मानी जा रही है।
दरअसल सवाल यह उठ रहा है कि देश की प्रथम नागरिक को लेकर सत्ता की राजनीति आखिर किस दिशा में जा रही है।
सवाल जो अब खुलकर पूछे जा रहे हैं
पहला सवाल
प्रकृति-पूजक आदिवासी परंपरा से आने वाली देश की राष्ट्रपति को अचानक मंदिर-मंदिर ले जाकर धार्मिक प्रतीकों में क्यों समेटा जा रहा है? क्या यह उनकी असली पहचान का सम्मान है या फिर सिर्फ राजनीतिक प्रतीक गढ़ने की कोशिश?
दूसरा सवाल
नए संसद भवन के उद्घाटन का संवैधानिक अधिकार देश की प्रथम नागरिक को होना चाहिए था। लेकिन जब यह अधिकार उनसे छीन लिया गया, तब सत्ता की राजनीति किस मर्यादा का पालन कर रही थी? और उस समय राष्ट्रपति की चुप्पी क्यों बनी रही?
तीसरा सवाल
अयोध्या में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा जैसे ऐतिहासिक आयोजन में राष्ट्रपति को आमंत्रित नहीं किया गया। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद को इस तरह किनारे करना क्या लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप था?
चौथा सवाल
जब राष्ट्रपति मथुरा-वृंदावन के दौरे पर थीं और न राज्यपाल पहुँचे, न मुख्यमंत्री क्या यह संवैधानिक पद की खुली अवमानना नहीं थी? उस अपमान पर तब सत्ताधारी नेताओं की आवाज़ क्यों नहीं गूँजी?
पाँचवां और सबसे बड़ा सवाल
मणिपुर सहित देश के कई हिस्सों में आदिवासी समाज और महिलाओं के साथ हुई भयावह घटनाओं पर राष्ट्रपति की नैतिक प्रतिक्रिया क्यों दिखाई नहीं दी? क्या देश की प्रथम नागरिक की चुप्पी भी अब राजनीतिक संदेश बन चुकी है?
सत्ता से सीधा टकराव
ममता बनर्जी का यह बयान उस राजनीतिक माहौल में आया है जब देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
उनका तर्क साफ है
राष्ट्रपति का पद किसी दल की राजनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की संवैधानिक आत्मा का प्रतीक है।
और यही वजह है कि उनका यह बयान अब केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सत्ता से सीधा टकराव माना जा रहा है।
एक बात तो साफ है
ममता बनर्जी ने वह सवाल ज़ोर से पूछ दिया है जिसे कई लोग मन में दबाकर बैठे थे।
अब देखना यह है कि दिल्ली की सत्ता इन सवालों का जवाब देती है या फिर हमेशा की तरह खामोशी की दीवार खड़ी कर देती है।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

