विनोद नेताम
नई दिल्ली/रायपुर/विशेष रिपोर्ट _
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों बयानबाज़ी का पारा चरम पर है। महिला एवं बाल विकास व समाज कल्याण मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने कांग्रेस पर करारा हमला बोलते हुए उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के हालिया बयान को “लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा” करार दिया है।
मंत्री राजवाड़े ने कहा कि खड़गे द्वारा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कथित रूप से इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक शब्द न केवल एक व्यक्ति का अपमान हैं, बल्कि उन करोड़ों मतदाताओं की भावनाओं का भी अनादर हैं जिन्होंने मोदी को देश की बागडोर सौंपी है। उन्होंने तीखे लहजे में कहा“कांग्रेस अब विचारों की लड़ाई हार चुकी है, इसलिए शब्दों की मर्यादा भी छोड़ चुकी है।”लेकिन इस सियासी जंग का दूसरा पहलू भी उतना ही गर्म है। जरा सोचियें क्या प्रधानमंत्री जी ने कभी विपक्षी राजनितिक दलों से तालुकात रखने वाले नेताओं को कभी चुनावी मंचों से भाषा की गरिमा को बगल में रखते हुए नहीं कोसा है? कांग्रेस पार्टी की जर्सी गाय जैसे शब्दों का उपयोग करना एक प्रधानमंत्री के लिये क्या शोभनीय हो सकता है यह एक शोध का विषय माना जा सकता है। बहरहाल राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि क्या भाषा की मर्यादा सिर्फ एक पक्ष के लिए लागू होती है?
विपक्षी दलों का आरोप है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान कई मौकों पर उनके भाषणों में विपक्षी नेताओं को “नक्सली सोच वाला” या “आतंकी मानसिकता से प्रेरित” तक बताया गया है।

ऐसे में अब कांग्रेस पूछ रही है,“जब तलवार दोनों तरफ से चल रही है, तो नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाएगा?”बावजूद इसके सन्नी लियोन के नाम पर महतारी वंदन योजना का आंबटन करवाने वाली एक जिम्मेदार महिला बाल विकास व समाज कल्याण मंत्री मंत्री राजवाड़े ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि “देश की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सख्ती को राजनीतिक बयानबाज़ी से जोड़ना गलत है। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्षों में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर देश को सुरक्षित बनाया है, यही उनकी पहचान है।”
सियासत में शब्दों की जंग,मर्यादा या मजबूरी?
सियासत में बदजुबानी का यह पूरा घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि 2026 की सियासत अब मुद्दों से ज्यादा शब्दों की धार पर लड़ी जा रही है। एक तरफ सत्ता पक्ष कांग्रेस पर “गिरती भाषा” का आरोप लगा रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष सत्ता के “तीखे और विभाजनकारी बयान” गिना रहा है। अब ऐसे में जनता के बीच अब असली सवाल यही है कि क्या यह लोकतंत्र की स्वस्थ बहस है? या फिर सियासी दलों की बेकाबू जुबान का नतीजा? जबकि जनता के मुद्दे शिक्षा,स्वास्थ्य, रोजगार,गरीबी
और मंहगाई गई तेल लेने।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

