विनोद नेताम
छत्तीसगढ़/ बालोद/लोहारा/ विशेष रिपोर्ट_
बालोद जिले के डौंडी लोहारा विकासखंड अंतर्गत आने वाला तूएगोंदी क्षेत्र इन दिनों सिर्फ एक गांव या धार्मिक स्थल का नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह “नियम बनाम रसूख”, “ग्रामसभा बनाम प्रभाव” और “कानून बनाम चुप्पी” की बहस का केंद्र बनता जा रहा है और इसके पीछे एक ही व्यक्ति का नाम है बाबा बालकदास।
इस बिच स्थानीय आदिवासी समाज और ग्रामीणों के बीच यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र, जहां ग्रामसभा की भूमिका सर्वोपरि मानी जाती है, वहां भूमि उपयोग, निर्माण, विस्तार और प्रशासनिक अनुमति से जुड़े मामलों में पारदर्शिता कितनी मजबूत रही है? बाबा बालकदास ने तो मजबूत पारदर्शिता कानून के बिचो बिच में अवैध सम्राज्य का बेजोड़ किला बना लिया है। जबकि
संविधान आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा को महज एक औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र की मजबूत रीढ़ मानता है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी मामले को लेकर आपत्तियां, प्रक्रिया या स्थानीय सहमति पर प्रश्न खड़े होते हैं, तो क्या उनकी निष्पक्ष और खुली जांच सुनिश्चित होती है?
गरीब पर सख्ती, प्रभावशाली पर नरमी? यही वह सवाल है जो अब जनता के बीच सबसे ज्यादा गूंज रहा है। यदि नियमों का डंडा कमजोर और गरीबों पर तेजी से चलता है, तो फिर विवादों या चर्चाओं में घिरे प्रभावशाली मामलों पर वही तत्परता, वही पारदर्शिता और वही जवाबदेही क्यों नहीं दिखती? स्थानीय आदीवासी समाज की मांग साफ है।
यदि सब कुछ नियमों और प्रक्रिया के अनुरूप हुआ है, तो प्रशासन खुलकर रिकॉर्ड, अनुमति और प्रक्रिया स्पष्ट करे और यदि कहीं कोई विवाद, आपत्ति या प्रक्रिया संबंधी प्रश्न हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाया जाए। प्रशासनिक चुप्पी पर उठते सवाल बालोद जिला प्रशासन की कार्यशैली को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चर्चा बनी हुई है। लोग यह जानना चाहते हैं कि भूमि, वन क्षेत्र, स्थानीय अनुमति और प्रशासनिक फैसलों से जुड़े विवादों में पारदर्शिता कितनी मजबूत है और जनता को स्पष्ट जानकारी कितनी मिलती है।कुछ लोगों के बीच यह सवाल भी उठता है कि जब किसी संवेदनशील मामले में कार्रवाई या जांच की चर्चा होती है और बाद में प्रशासनिक बदलाव जैसे घटनाक्रम सामने आते हैं, तो क्या ऐसे मामलों पर अधिक पारदर्शिता जरूरी नहीं हो जाती?
हालांकि ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है, लेकिन जनता के भीतर जिज्ञासा और सवाल बने रहना भी लोकतंत्र का हिस्सा है।
आस्था बनाम जवाबदेही यह मुद्दा अब किसी व्यक्ति विशेष से आगे बढ़कर एक नैतिक और प्रशासनिक प्रश्न बन गया है।
क्या किसी भी धार्मिक, सामाजिक या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़े मामलों में भी कानून उतनी ही सख्ती और समानता से लागू होता है, जितना एक सामान्य नागरिक पर और समाज के भीतर यह सवाल भी उठता है।क्या आध्यात्मिक या सामाजिक नेतृत्व का वास्तविक अर्थ प्रभाव, विशेष व्यवहार और विवादों के केंद्र में रहना है या फिर पारदर्शिता, सादगी और जनविश्वास का प्रतीक बनना?
अब तीन बड़े सवाल व्यवस्था के सामने
•क्या ग्रामसभा की शक्ति वास्तव में प्रभावी है?
•क्या प्रशासन हर मामले में निष्पक्ष और जवाबदेह दिखता है?
•क्या कानून सचमुच सबके लिए बराबर है?
तूएगोंदी का यह मामला अब केवल जमीन, निर्माण या स्थानीय विवाद नहीं रहा यह व्यवस्था की पारदर्शिता, प्रशासन की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की परीक्षा बनता दिख रहा है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित पक्ष और जिला प्रशासन इन सवालों पर क्या स्पष्टता देते हैं।
क्योंकि जनता शोर नहीं, सच,पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

