📍 स्थान : छत्तीसगढ़ | बालोद / गरियाबंद
🖊️ विशेष रिपोर्ट | ChhattisgarhJunction
📰 विस्तृत न्यूज़ रिपोर्ट
“देख रहा है ना बिनोद…” — यह वाक्य इन दिनों छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर सटीक बैठता है।
राज्य में एक के बाद एक बड़े सरकारी और धार्मिक आयोजनों में टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल अब खुलकर सामने आने लगे हैं।
एक ओर बालोद जिले के दूधली गांव में आज से राष्ट्रीय रोवर-रेंजर जंबूरी का भव्य आयोजन शुरू हो चुका है। पाँच दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम का उद्घाटन छत्तीसगढ़ के राज्यपाल माननीय रमेन डेका और राज्य के स्कूली शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने किया। मंच से विकास, अनुशासन और युवा निर्माण की बातें की गईं, लेकिन मंच के पीछे की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
🔎 जंबूरी आयोजन पर गंभीर आरोप
सूत्रों के अनुसार, इस आयोजन के पीछे जिस आरएसएस नामक एनजीओ की भूमिका बताई जा रही है, उसके संचालक का एक करीबी — जिसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है — मंत्री पद तक पहुँच चुका है। आरोप है कि मंत्री बनते ही उसने अपने पूरे विभाग की जिम्मेदारी एक निजी टेंट व्यवसायी (जसपाल) को सौंप दी।
यह सौंपा जाना किसी प्रशासनिक योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि तयशुदा कमीशन पर बताया जा रहा है। अंदरखाने चर्चा है कि यह कमीशन करीब 50 प्रतिशत तक का है। यानी सरकारी आयोजन की आधी राशि सीधे ‘मैनेजमेंट’ में जा रही है।
सूत्रों का दावा है कि यह पूरा मामला लगभग 10 करोड़ रुपये के इर्द-गिर्द घूमता है। योजना यह थी कि
- 5 करोड़ रुपये में काम दिखाया जाए,
- और शेष 5 करोड़ रुपये की अंदरूनी बंदरबांट की जाए।
लेकिन हिस्सेदारी को लेकर आपसी खींचतान इतनी बढ़ गई कि यह विवाद अब सत्ता के गलियारों से निकलकर सड़कों और चर्चाओं तक पहुँच चुका है। बताया जा रहा है कि लूट के हिस्से को लेकर पुराने और नए चेहरों के बीच खुला टकराव चल रहा है।
🕉️ राजिम कुंभ मेला भी विवादों में
इसी बीच छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल राजिम कुंभ मेला 2026 भी अब विवादों की चपेट में आता नजर आ रहा है।
1 फरवरी से 15 फरवरी 2026 तक आयोजित होने वाले इस महाकुंभ की व्यवस्थाओं के लिए लगभग 6 करोड़ रुपये के दो बड़े टेंडर जारी किए गए हैं।
लेकिन जिस तेजी से यह टेंडर प्रक्रिया पूरी की जा रही है, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
📄 टेंडर टाइमलाइन पर उठे सवाल
गरियाबंद जिला कलेक्टर कार्यालय द्वारा—
- 7 जनवरी को टेंडर प्रकाशित
- 8 जनवरी को प्री-बिड मीटिंग
- 9 जनवरी को बीड सबमिशन
- 10 जनवरी को प्रेजेंटेशन और टेंडर क्लोज
यानी सिर्फ 3 से 4 कार्यदिवस में पूरी प्रक्रिया निपटा दी जा रही है।
जबकि सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट नियमों और सामान्य वित्तीय नियम (GFR) के अनुसार,
👉 किसी भी बड़े सार्वजनिक कार्य के टेंडर में
👉 प्रकाशन और क्लोजिंग के बीच न्यूनतम 21 दिन का समय अनिवार्य होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम समय-सीमा में न तो प्रतिस्पर्धा संभव है और न ही पारदर्शिता।
⚖️ राजनीतिक हलकों में हलचल
इस पूरे मामले को लेकर पहले ही छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ भाजपा नेता और सांसद बृजमोहन अग्रवाल सवाल उठा चुके हैं। जंबूरी आयोजन के नाम पर टेंडर अनियमितताओं को लेकर उनके बयान के बाद सियासी माहौल गरमा गया है।
अब सवाल यह उठता है कि—
- क्या बड़े आयोजनों के नाम पर टेंडर प्रक्रिया को जानबूझकर सीमित किया जा रहा है?
- क्या चुनिंदा लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए नियमों को ताक पर रखा जा रहा है?
- और क्या लगातार सामने आ रहे ये आरोप आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित होंगे?
फिलहाल, प्रशासनिक चुप्पी और तेज़ी से निपटाए जा रहे टेंडर कई संदेह खड़े कर रहे हैं।
ChhattisgarhJunction इस पूरे मामले पर नज़र बनाए हुए है।
जैसे-जैसे नई जानकारी सामने आएगी, पाठकों को लगातार अपडेट किया जाएगा।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

