Vinod Netam
नई दिल्ली/भोपाल/रायपुर/ विशेष रिपोर्ट_
देश में “आत्मनिर्भरता” और इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार की नीतियों का सबसे बड़ा खामियाजा आज किसान भुगत रहा है। सरकार की अपील पर किसानों ने बड़े पैमाने पर मक्का की खेती की, लेकिन जब फसल तैयार होकर मंडियों में पहुंची तो किसानों को MSP का वादा हवा-हवाई साबित होता दिख रहा है।
सरकार ने मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹2400 प्रति क्विंटल घोषित किया था, लेकिन हकीकत यह है कि देश की कई मंडियों में किसानों को सिर्फ ₹1100 से ₹1200 प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। यानी घोषित MSP का लगभग आधा।
लागत भी नहीं निकल रही, किसान बेहाल
किसानों का कहना है कि एक क्विंटल मक्का पैदा करने में करीब ₹1500 तक लागत आ रही है। ऐसे में ₹1100–1200 में बिक्री का मतलब साफ है।
किसान अपनी जेब से पैसा लगाकर खेती कर रहा है। कई जगहों पर किसान मजबूरी में अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेच रहे हैं, क्योंकि सरकारी खरीद केंद्र खुले ही नहीं हैं या खरीद बेहद सीमित है।
उत्पादन बढ़ा, लेकिन खरीद नहीं
सरकार ने इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने और पेट्रोल में मिश्रण के लिए किसानों को मक्का लगाने के लिए प्रोत्साहित किया था। इसका असर यह हुआ कि कई राज्यों में मक्का का उत्पादन तेजी से बढ़ गया। खबरों के मुताबिक केवल मध्यप्रदेश में ही एक साल में करीब 21 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त उत्पादन हुआ।
लेकिन जब फसल बाजार में आई, तो सरकार की तरफ से MSP पर खरीद का कोई ठोस इंतजाम नहीं दिखा।
एक तरफ किसान परेशान, दूसरी तरफ आयात की चर्चा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश में मक्का का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर है और किसान अपनी उपज बेचने के लिए भटक रहे हैं, तब विदेश से मक्का और कैटल फीड उत्पादों के आयात की खबरें क्यों सामने आ रही हैं?
किसान संगठनों का आरोप है कि यदि ऐसा हुआ तो देश के किसानों की हालत और खराब हो जाएगी।
किसानों में गुस्सा, सरकार से जवाब की मांग
किसानों का कहना है कि पहले सरकार ने “आत्मनिर्भर भारत” के नाम पर उन्हें फसल बदलने के लिए प्रेरित किया, लेकिन अब जब उपज तैयार है तो सरकारी खरीद से हाथ खींच लिए गए।
किसान पूछ रहे हैं—
अगर MSP पर खरीद नहीं करनी थी, तो फिर किसानों को मक्का उगाने के लिए प्रोत्साहित क्यों किया गया?
बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या MSP सिर्फ कागजों तक सीमित है?
अगर किसानों को घोषित समर्थन मूल्य भी नहीं मिल रहा, तो आखिर किसान किस भरोसे खेती करे?
कृषि नीति पर उठते इन सवालों के बीच सरकार के सामने चुनौती है कि वह जल्द स्पष्ट करे।
क्या किसानों को MSP का हक मिलेगा या फिर उन्हें बाजार की दया पर ही छोड़ दिया जाएगा?

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

