विनोद नेताम

छत्तीसगढ़/ बालोद/गुरुर /विशेष रिपोर्ट_
(Chhattisgarh junction) छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री खाद्यान्न योजना के तहत गरीब परिवारों को निःशुल्क चावल दिया जा रहा है। प्रदेश में इस योजना का क्रियान्वयन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार कर रही है।

सरकार का उद्देश्य साफ है,गरीब परिवारों को दो वक्त की रोटी की चिंता से मुक्त करना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
कागजों में यह योजना गरीबों के लिए राहत का बड़ा जरिया दिखाई देती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
ग्रामीण इलाकों से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि सरकारी चावल का खुलेआम कारोबार चल रहा है। जिन लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक है, वे भी मुफ्त चावल का लाभ ले रहे हैं और उसे घर में खाने के बजाय बाजार में बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि बालोद जिले के कई ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी चावल का समानांतर बाजार तैयार हो चुका है। गांवों में खरीदार खुद घर-घर जाकर चावल खरीद रहे हैं। बताया जाता है कि योजना के तहत मिले चावल को ग्रामीण 25 से 30 रुपये प्रति किलो तक बेच रहे हैं। इस तरह हर महीने मुफ्त चावल बेचकर कई लोग डबल मुनाफे का खेल खेल रहे हैं।
हालात इतने अजीब हो चुके हैं कि गांवों में तंज कसते हुए लोग कहने लगे हैं।
“फोकट के चांउर कोट-कोट ले खा, अऊ शोले में तंऊर।”
यह कहावत अब सिर्फ मजाक नहीं रही, बल्कि सरकारी योजना की जमीनी सच्चाई बनती जा रही है।
छत्तीसगढ़ की पहचान बरसों से धान और किसान से जुड़ी रही है। प्रदेश धान उत्पादन के मामले में देश के कई राज्यों से आगे खड़ा दिखाई देता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब राज्य में धान की पैदावार इतनी अधिक है, तब सरकार को योजना लागू करने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक ही पहुंचे।
वास्तविकता यह है कि जिन लोगों को इस योजना की सबसे ज्यादा जरूरत है, वे अक्सर व्यवस्था की कमजोरियों के कारण पीछे छूट जाते हैं, जबकि सक्षम और संपन्न लोग सरकारी योजना का फायदा उठाकर मुफ्त चावल को नकद कमाई में बदलने का धंधा कर रहे हैं।
मामला सिर्फ बालोद जिले तक सीमित नहीं माना जा रहा। ग्रामीण इलाकों में सरकारी राशन की निगरानी व्यवस्था कमजोर होने के कारण यह खेल धीरे-धीरे फैलता हुआ नजर आ रहा है।
दरअसल फ्री और फोकट की राजनीति पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ड ऑफ इंडिया भी समय-समय पर चुनावों के दौरान मुफ्त योजनाओं और “फ्रीबी कल्चर” पर चिंता जता चुका है। इसके बावजूद देश की कई सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए मुफ्त योजनाओं को ही राजनीतिक हथियार बनाती दिखाई देती हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि
क्या सरकार और प्रशासन इस खेल पर लगाम लगाएंगे?
या फिर गरीबों के नाम पर चल रही योजनाओं का “फोकट के चांउर” वाला यह कारोबार यूं ही चलता रहेगा?

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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