विनोद नेताम (वरिष्ठ पत्रकार)छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़/ बालोद/ विशेष रिपोर्ट _
छत्तीसगढ़ में अमृतकाल, सुशासन और गांवों के सर्वांगीण विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच बालोद जिले की पंचायतों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह विकास की नहीं बल्कि “कमीशन तंत्र” की कहानी बयां करती नजर आ रही है। कागजों में विकास की रफ्तार बुलेट ट्रेन जैसी दिखाई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत में गांवों की सड़कों, भवनों और मूलभूत सुविधाओं की हालत आज भी बदहाल नजर आती है।
राज्य सरकार ने ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी पंचायतों को इसलिए सौंपी थी ताकि गांवों तक योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचे। लेकिन अब पंचायतों में विकास योजनाओं से ज्यादा “15 प्रतिशत कमीशन” की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों का दावा है कि कई योजनाओं के शुरू होने से पहले ही “कौन कितना प्रतिशत लेगा” इसकी गणित तय कर ली जाती है।
बताया जाता है कि पंचायत स्तर पर बनने वाली सड़कों, सामुदायिक भवनों, शौचालयों और अन्य निर्माण कार्यों में राशि स्वीकृत होते ही करीब 15% तक कमीशन का खेल शुरू हो जाता है। ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के बीच होने वाली इस बंदरबांट के कारण योजनाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यही कारण है कि कई निर्माण कार्य कुछ ही महीनों में दम तोड़ते नजर आते हैं।
खनिज न्यास निधि से लेकर अन्य विकास योजनाओं तक लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गांवों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं दिखती। ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं कागजों में बिजली की रफ्तार से पूरी हो जाती हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर ढूंढने से भी नहीं मिलता।
स्थानीय लोग अब व्यंग्य में कहने लगे हैं।

“हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।”
अर्थात व्यवस्था की हर शाख पर बैठे लोग अपना-अपना हिस्सा साधने में लगे हैं और विकास की असली मंशा कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है।
पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा “स्वयं विकास मॉडल” की हो रही है, जिसमें आरोप है कि पंचायतों में होने वाले विकास कार्यों से गांवों की अपेक्षा कुछ जिम्मेदार लोगों का ही विकास तेजी से होता दिखाई देता है। यही वजह है कि अब पंचायतों में होने वाले हर निर्माण कार्य और योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठने लगे हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि बालोद जिले की पंचायतों में चल रहा यह 15% कमीशन का खेल आखिर कब रुकेगा?
क्या शासन-प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर ग्रामीणों को वास्तविक विकास का भरोसा दिलाएगा, या फिर पंचायतों का विकास मॉडल यूं ही “कमीशन तंत्र” की भेंट चढ़ता रहेगा।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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