मुद्दों पर चुप्पी, नारों की गूंज: बदलती राजनीति पर बड़ा सवाल,मुद्दों से भागती सत्ता और सवालों से डरती राजनीति।

विनोद नेताम (वरिष्ठ पत्रकार)

विशेष खबरें_
देश में आजकल एक अजीब राजनीतिक फैशन चल पड़ा है।
मुद्दों पर बात मत करो, सवाल मत पूछो, बस तालियाँ बजाओ और जयकारे लगाओ,”हर हर फलाना, घर घर ठेकाना”
महंगाई बढ़ रही है,लेकिन यह मुद्दा नहीं।
बेरोज़गारी बढ़ रही है,मगर यह भी मुद्दा नहीं।
देश पर कर्ज़ लगातार बढ़ता जा रहा है,पर यह भी कोई चिंता नहीं।
रुपया गिर रहा है,पर उस पर भी चुप्पी साध ली गई है।
यानी जनता की जेब खाली होती जाए,पर सत्ता की राजनीति भरी-पूरी दिखनी चाहिए।
आज आम आदमी की हालत यह है कि सुबह से शाम तक वह सिर्फ खर्चों से जूझ रहा है।
बिजली महंगी, पेट्रोल-डीजल महंगा, गैस सिलेंडर महंगा, रसोई का हर सामान महंगा।
लेकिन जब इन सवालों को उठाया जाता है तो जवाब में आंकड़े कम और भाषण ज्यादा मिलते हैं।
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए –
राजनीति में धर्म और नैतिकता का सबसे ऊँचा झंडा उठाने वाले लोग जब चंदे की बात आती है तो हर दरवाज़ा खुला रखते हैं।

मीडिया रिपोर्टों में यह तथ्य सामने आया कि बीफ निर्यात से जुड़ी बड़ी कंपनियों ने भी राजनीतिक दलों को भारी चंदा दिया।
अब सवाल यह है कि जो राजनीति जनता के सामने धर्म की दुहाई देकर वोट मांगती है, वही राजनीति चंदे के समय अपने सिद्धांतों को क्यों भूल जाती है?
लेकिन असली समस्या चंदे से भी बड़ी है,समस्या है जवाबदेही से बचने की आदत।
जनता हर चीज़ पर टैक्स देती है।
पेट्रोल पर टैक्स, गैस पर टैक्स, खाने के सामान पर टैक्स, हर छोटी-बड़ी चीज़ पर टैक्स।
लेकिन जब वही जनता पूछती है कि उसके पैसे का हिसाब क्या है, तो सत्ता को यह सवाल नागवार क्यों गुजरता है?
हजारों करोड़ रुपये खर्च कर भव्य सरकारी इमारतें बन सकती हैं, चमचमाते दफ्तर खड़े हो सकते हैं, मगर अगर कोई यह पूछ ले कि आखिर यह धन किसका है,तो उसे तुरंत “राजनीतिक हमला” कह दिया जाता है।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा सच यही है कि जनता मालिक होती है और सरकार सिर्फ उसकी सेवक।
लेकिन जब सेवक खुद को मालिक समझने लगें, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ना तय है,सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता।
सवाल पूछना लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार होता है।
और याद रखिए,यह देश किसी एक व्यक्ति, एक पार्टी या एक विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है।
यह जनता का देश है,और जनता अब सिर्फ भाषण नहीं, जवाब चाहती है।
क्योंकि इतिहास गवाह है,जब जनता सवाल पूछना शुरू करती है,
तो सत्ता के सबसे मजबूत सिंहासन भी हिलने लगते हैं।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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