कांकेर के जंगलों में गोलियों और भट्ठियों की गूंज ,वन्यजीवों का मांस भूनते शिकारी, और सरकार के दावों की पोल खुलती तस्वीर।

विनोद नेताम ( वरिष्ठ पत्रकार) छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़/कांकेर/चारामा/ विशेष रिपोर्ट _

छत्तीसगढ़ के कांकेर वन मंडल क्षेत्र से सामने आई घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे जमीन पर कितने खोखले हैं। 8 मार्च 2026 को राज्य स्तरीय उड़नदस्ता को मिली गोपनीय सूचना के बाद जब वन विभाग की टीम ने कार्रवाई की, तो जो नज़ारा सामने आया वह किसी जंगल राज से कम नहीं था।
ग्राम जुनवानी में वन विभाग की टीम जब मौके पर पहुंची तो वहां दो जंगली सूअरों के मांस को आग में भूनकर पकाया जा रहा था। यानी जंगल के असली मालिकों को मारकर उनकी लाश पर दावत उड़ाने की तैयारी चल रही थी। टीम ने मौके से मांस और अन्य सामग्री जब्त कर आरोपियों के खिलाफ वन अपराध प्रकरण दर्ज किया, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इतनी बेखौफ गतिविधि किसके संरक्षण में चल रही थी?
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। इसी अभियान के दौरान एक वाहन को रोककर जांच की गई तो उसमें एक मादा जंगली सूअर को चारों पैर और मुंह बांधकर जिंदा ले जाया जा रहा था। यह दृश्य न केवल क्रूरता की हद दिखाता है बल्कि यह भी बताता है कि वन्यजीव तस्करी का नेटवर्क कितना संगठित और निर्भीक हो चुका है। वन विभाग ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उस वन्यप्राणी को मुक्त कराया और वाहन सहित आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया।
इसी क्रम में एक अन्य स्थान पर भी जंगली सूअर का अवैध शिकार कर उसका मांस काटते हुए आरोपियों को रंगे हाथों पकड़ा गया, जहां से वन्यप्राणी के अवशेष बरामद किए गए।

इन सभी मामलों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और कांकेर न्यायालय में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
लेकिन इस पूरी कार्रवाई ने कई असहज सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
जंगलों की सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने वाली व्यवस्था के बावजूद अगर शिकारियों की भट्ठियां गांवों में धधक रही हों, और वन्यजीवों को जिंदा बांधकर गाड़ियों में ढोया जा रहा हो, तो यह केवल अपराधियों की हिम्मत नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरी भी उजागर करता है।
राजनीतिक मंचों से जंगल और आदिवासी इलाकों की सुरक्षा के बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जंगलों के भीतर वन्यजीवों का जीवन आज भी शिकारियों की बंदूक और जाल के बीच झूल रहा है।
हालांकि वन विभाग की इस कार्रवाई से अवैध शिकार के नेटवर्क को झटका जरूर लगा है और आरोपियों की गिरफ्तारी से एक सख्त संदेश भी गया है। लेकिन यह घटना इस बात की भी चेतावनी है कि अगर निगरानी और जवाबदेही मजबूत नहीं हुई तो जंगलों की यह प्राकृतिक धरोहर धीरे-धीरे सिर्फ फाइलों और भाषणों में ही बची रह जाएगी।
वन्यजीव केवल जंगल का हिस्सा नहीं हैं, वे प्रकृति का संतुलन हैं।
और अगर यह संतुलन टूटता है, तो उसकी कीमत सिर्फ जंगल नहीं, पूरी मानव सभ्यता को चुकानी पड़ेगी।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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