विनोद नेताम (वरिष्ठ पत्रकार)
देश दुनिया की विशेष खबरें_
देश में बढ़ती तेल और गैस की कीमतों तथा संभावित आपूर्ति संकट को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस बीच सरकार की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आने और ‘सूत्रों’ के हवाले से खबरें सामने आने पर विपक्ष और आम लोगों के बीच सवाल खड़े होने लगे हैं।
दुनिया तेल संकट के दौर से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें उछाल मार रही हैं, युद्ध की आहटें तेज हैं और कई देशों में पेट्रोल-डीजल तथा गैस की किल्लत खुलकर सामने आने लगी है। पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश तक में हालात ऐसे हैं कि लोग पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
लेकिन भारत में एक अजीब सा लोकतांत्रिक प्रयोग चल रहा है यहाँ सरकार नहीं, “सूत्र” बोल रहे हैं।
अखबारों में खबर छपती है
“सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत में तेल और गैस की कोई कमी नहीं है।”
अब जरा इस बयान की गंभीरता समझिए।
देश में मंत्री हैं, पेट्रोलियम मंत्रालय है, बड़े-बड़े अधिकारी हैं… फिर भी जनता को जानकारी देने के लिए सरकार सामने नहीं आती, बल्कि ‘सूत्र’ सामने आ जाते हैं।
सवाल यह है कि आखिर यह सूत्र है कौन?
क्या यह कोई संवैधानिक पद है?
क्या यह कोई जवाबदेह संस्था है?
या फिर यह सिर्फ जिम्मेदारी से बचने का सबसे सुरक्षित रास्ता है?
क्योंकि जमीन से जो खबरें आ रही हैं, वे सरकारी सूत्रों के दावों से मेल नहीं खातीं।
बताया जा रहा है कि
घरेलू गैस सिलेंडर की बुकिंग अवधि 21 से बढ़ाकर 25 दिन कर दी गई।
कई जगह कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई रोकने या सीमित करने की बातें सामने आ रही हैं।
अब आम आदमी का सीधा सवाल है।
अगर कमी नहीं है, तो ये बंदिशें क्यों लगाई जा रही हैं?
और अगर कमी है, तो सरकार सच बोलने से डर क्यों रही है?
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वही होती है जब सत्ता सच बोलने से कतराने लगे।
देश की जनता नासमझ नहीं है।
140 करोड़ लोगों का देश अफवाहों से नहीं, तथ्यों और पारदर्शिता से चलता है।
अगर देश में तेल और गैस का पर्याप्त भंडार है तो सरकार को खुलकर बताना चाहिए कि
कितना स्टॉक है,
कितने दिनों की जरूरत पूरी हो सकती है,
और आयात की क्या व्यवस्था है।
और अगर वैश्विक हालात की वजह से दबाव है, तो भी सरकार को खुलकर कहना चाहिए।
ताकि देश की जनता भी ऊर्जा बचत और जिम्मेदार उपयोग में सहयोग कर सके।
लेकिन फिलहाल जो हो रहा है, वह और भी ज्यादा खतरनाक है।
न साफ घोषणा, न साफ इनकार… और बीच में “सूत्रों” का रहस्यमय बयान।
याद रखिए, जब सरकार साफ बोलना बंद कर देती है, तब अफवाहें बोलना शुरू कर देती हैं।
इसलिए समय की मांग है कि सरकार सूत्रों की आड़ छोड़कर सामने आए,
मंत्री और अधिकारी खुद स्थिति स्पष्ट करें,
ताकि देश में भ्रम और बेवजह की बहस खत्म हो।
क्योंकि लोकतंत्र में सरकार सूत्रों से नहीं, जवाबदेही से चलती है।
और जनता का एक ही सवाल है।
देश चल रहा है या “सूत्रों की सरकार” चल रही है?

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

