विनोद नेताम
छत्तीसगढ़/ बालोद/विशेष रिपोर्ट_
बालोद जिले के गुरुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम बोड़रा का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अब स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि बदइंतजामी और लापरवाही का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यहां की स्थिति यह सवाल उठाने को मजबूर करती है,क्या ग्रामीणों की जिंदगी की कीमत अब छुट्टी के कैलेंडर से तय होगी?
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब अस्पताल में मौजूद स्टाफ नर्स का रवैया सामने आया। जानकारी लेने पहुंचे मीडिया से सहयोग करने के बजाय स्टाफ नर्स ने उल्टा सवाल दाग दिया “कौन शिकायत किया? मेरे लिए कोई शिकायत क्या तभी आप आए हो?”
इतना ही नहीं, स्टाफ नर्स ने खुद स्वीकार किया कि वह दोपहर 2:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक “लंच छुट्टी” पर थे। जब मीडिया ने इस लापरवाही पर सवाल उठाया, तो जवाब मिला“आपको किसने भेजा? और हम आपको जानकारी क्यों दें?”
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि स्टाफ नर्स ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि छुट्टी के दिन केवल सड़क दुर्घटना या डिलीवरी जैसे “इमरजेंसी केस” ही देखे जाते हैं, बाकी मरीजों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यह बयान न केवल संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या सामान्य बीमारी से जूझ रहे मरीज “इमरजेंसी” की श्रेणी में नहीं आते? क्या भर्ती मरीजों की देखभाल छुट्टी के दिन जरूरी नहीं होती?
सूत्रों के अनुसार, छुट्टी के दिन अस्पताल में भर्ती बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं बिना किसी देखभाल के घंटों तक तड़पते रहे। न समय पर दवा, न जांच, न कोई निगरानी यह स्थिति किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था के लिए शर्मनाक है।
प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी और लू का प्रकोप जारी है, जिससे बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। ऐसे समय में स्वास्थ्य केंद्रों की सतर्कता जीवन रक्षक होनी चाहिए, लेकिन बोड़रा में हालात इसके बिल्कुल विपरीत नजर आए।
सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए जा रहे बड़े-बड़े दावे इस एक घटना से ही खोखले साबित होते दिख रहे हैं। कागजों में योजनाएं दमदार हो सकती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी हकीकत बोडरा जैसे केंद्रों में साफ दिखाई देती है।
अब सवाल सीधे और तीखे हैं:
क्या जिम्मेदार अधिकारी इस खुली लापरवाही पर कार्रवाई करेंगे?
क्या ऐसे गैर-जिम्मेदार कर्मचारियों पर कोई जवाबदेही तय होगी?
या फिर ग्रामीण जनता यूं ही उपेक्षा और बदहाल व्यवस्था का शिकार होती रहेगी?
बोड़रा का यह स्वास्थ्य केंद्र अब केवल इलाज का स्थान नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना बन गया है जहां जिम्मेदारी से ज्यादा बहाने और संवेदनशीलता से ज्यादा लापरवाही हावी है।
समय आ गया है कि दावों की नहीं, जवाबदेही की राजनीति हो वरना ‘स्वास्थ्य केंद्र’ जैसे संस्थान जनता के भरोसे नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी के प्रतीक बनते रहेंगे।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

