छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 16 फरवरी 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि “योनि के ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं माना जा सकता।”प्रवेश नहीं तो रेप नहीं”

विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार
छत्तीसगढ़/बिलासपुर/ विशेष रिपोर्ट_
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले पर देश को ठहर कर सोचना होगा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने कहा
अगर पेनेट्रेशन सिद्ध नहीं है,तो अपराध “बलात्कार” नहीं, “बलात्कार का प्रयास” है।
कानूनी भाषा में यह व्याख्या हो सकती है।
लेकिन सामाजिक भाषा में यह एक विस्फोटक संदेश बन सकती है।
यह केस 2004 का है, जिसमें मुख्य आरोपी वासुदेव गोड़ पर एक महिला के साथ बलात्कार का आरोप लगा था।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376 (बलात्कार) के तहत 7 साल की सजा सुनाई थी।
जिसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर किया था।
इस पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 16 फरवरी 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि “योनि के ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात (ejaculation) करना बलात्कार नहीं माना जा सकता।
क्योंकि बलात्कार की परिभाषा में penetration (प्रवेश) जरूरी है, न कि सिर्फ वीर्यपात
कोर्ट ने इसे बलात्कार का प्रयास (attempt to rape) माना, जो IPC की धारा 511 और 375 के तहत आता है।
इसका नतीजा ये हुआ की सजा को 7 साल से घटाकर 3.5 साल कर दिया गया।
यही कारण है कि यह फैसला सिर्फ एक केस का फैसला नहीं है।यह न्याय की परिभाषा पर बहस है।मामला क्या कहता है?
अदालत ने कहा रेप के लिए प्रवेश साबित होना जरूरी है।
सिर्फ जननांग को योनि के ऊपर रखना और स्खलन कर देना, अगर प्रवेश सिद्ध नहीं हुआ, तो उसे “अटेम्प्ट टू रेप” माना जाएगा।तकनीकी रूप से यह IPC की पारंपरिक व्याख्या पर आधारित है।लेकिन सवाल कानून से बड़ा है
असली सवाल अगर कोई व्यक्ति:
“पीड़िता को पकड़कर ले जाए,कपड़े उतारे कमरे में बंद करे जबरदस्ती यौन हमला करे”
लेकिन मेडिकल रिपोर्ट “प्रवेश” को निर्णायक रूप से साबित न कर पाए तो क्या अपराध का स्वरूप बदल जाएगा?
क्या आघात का स्तर भी बदल जाता है?
कानून बनाम अनुभव कानून कहता है, प्रवेश चाहिए।
महिला का अनुभव कहता है,हिंसा हुई। कानून सबूत मांगता है।लेकिन यौन अपराधों में सबूत हमेशा स्पष्ट नहीं होते।

हाइमन का intact होना मेडिकल अस्पष्टता
गवाही में छोटे अंतर ये सब अक्सर आरोपी के पक्ष में चले जाते हैं और यही डर है।यह फैसला क्यों खतरनाक मिसाल बन सकता है?अगर यह तर्क लोकप्रिय हो गया, तो आगे क्या होगा?हर बचाव पक्ष कहेगा, “प्रवेश सिद्ध नहीं। जांच एजेंसियों पर दबाव कम होगा। निचली अदालतें और कठोर मेडिकल प्रमाण मांगेंगी।पीड़िताएं केस दर्ज कराने से पहले सौ बार सोचेंगी।भारत में पहले ही बलात्कार के मामलों में सजा दर बहुत ऊँची नहीं है अगर “रेप” से “अटेम्प्ट” में बदलना आसान हुआ, तो आंकड़े भी बदलेंगे और संदेश भी।
असली मुद्दा: सहमति
निर्भया के बाद कानून बदला था,सहमति को केंद्र में रखा गया था।
“हल्का सा भी प्रवेश” पर्याप्त माना गया था लेकिन अदालतें अब भी तकनीकी शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। क्या हमें कानून को फिर से स्पष्ट करना होगा? क्या हमें यह तय करना होगा कि हिंसा का आकलन केवल “मिलीमीटर” में नहीं होगा?
समाज को समझना होगा,यह फैसला आरोपी को पूरी तरह मुक्त नहीं करता,लेकिन सजा कम करना एक संकेत जरूर देता है,संकेत यह कि: अगर प्रवेश सिद्ध नहीं हुआ, तो अपराध की श्रेणी बदलेगी और यह संकेत बहुतों के लिए चिंताजनक है।
यह सिर्फ एक केस नहीं
यह भविष्य के मुकदमों की दिशा तय कर सकता है। यह तय करेगा कि अदालतें किसे “पूर्ण बलात्कार” मानेंगी और किसे “प्रयास”। कानूनी शुद्धता जरूरी है।
लेकिन न्याय की संवेदनशीलता उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर कानून पीड़िता के अनुभव से बहुत दूर हो गया,
तो न्याय शब्द खोखला हो जाएगा।
देश को अब यह तय करना है:
क्या हम यौन हिंसा को तकनीकी परिभाषाओं तक सीमित रखेंगे?या सहमति और गरिमा को वास्तविक आधार बनाएंगे? फैसले अदालत देती है,लेकिन न्याय की दिशा समाज तय करता है और यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है।
योनि के ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं” जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ( छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट)
कालिजियम सिस्टम से बने जजों की बुद्धि देखिए “योनि के ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं!”छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
(बलात्कार के मामले में फैसला बदलते हुए) कानून की किताबों में शब्द बदलते ही क्या न्याय की आत्मा भी बदल जाती है?अगर ऐसी तकनीकी व्याख्याओं से ही फैसले होंगे, तो पीड़िता की आवाज़ आखिर कहाँ सुनी जाएगी?
समाज उम्मीद करता है कि अदालतें सिर्फ धाराओं का खेल नहीं, बल्कि संवेदनशील न्याय का उदाहरण बनें।

क्योंकि जब फैसलों की भाषा लोगों को चौंकाने लगे, तो भरोसे की नींव भी हिलने लगती है।”लड़की का स्तन पकड़ना, नाड़ा तोड़ना, बाहों में भींचना, बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता” जस्टिस राम मनोहर मिश्रा (इलाहाबाद हाईकोर्ट)

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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