अफीम फूंको योजना” की सांय-सांय शुरुआत? छत्तीसगढ़ में नशे का साम्राज्य या सरकार की नाकामी।

विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार

विशेष संवाददाता | ताबड़तोड़ सियासी रिपोर्ट_



कांदा चूचरो योजना की उपलब्धि के बाद अब अफिम फूंको योजना की सांय सांय शुरुआत। मुस्कुराते रहिये आप छत्तीसगढ़ में है।
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों एक नई “अघोषित योजना” चर्चा में है “अफीम फूंको योजना”

नाम भले ही व्यंग्यात्मक लगे, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा डरावनी है।
ताजा मामला रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र से सामने आया है, जहां अफीम की अवैध खेती पकड़ी गई। सवाल ये नहीं कि एक खेत मिला,सवाल ये है कि क्या पूरे प्रदेश में अब “सांय-सांय” अफीम उत्पादन की चेन चल पड़ी है?
सरकार व्यस्त, नशा मस्त?
प्रदेश की जनता जहां महंगाई, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रही है, वहीं जिम्मेदार जनसेवक रील और बयानबाजी में मशगूल नजर आ रहे हैं।
ज़मीन पर हकीकत ये है कि गांव-गांव में अवैध शराब,हर गली में सट्टा खुलेआम गांजा कारोबार और अब अफीम की खेती
क्या यही “विकास मॉडल” है? गंगाजल की कसम, लेकिन हकीकत उल्टी।
याद कीजिए वो वादे, जब शराबबंदी के लिए गंगाजल उठाकर कसम खाई गई थी।
लेकिन नतीजा क्या निकला?
शराबबंदी तो दूर,
अवैध शराब का नेटवर्क और मजबूत हुआ

सट्टा और नशे ने मिलकर गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी
अब उसी कड़ी में अफीम की एंट्री ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है।
बड़ा सवाल: ये “नशा अर्थव्यवस्था” किसके संरक्षण में?
जब एक-दो नहीं, बल्कि लगातार अलग-अलग इलाकों से नशे के कारोबार का खुलासा हो रहा है, तो सवाल उठना लाजमी है,क्या प्रशासन सो रहा है?
या फिर सब कुछ सांय-सांय संरक्षण में चल रहा है?
आखिर किसके इशारे पर ये ज़हरीला कारोबार फल-फूल रहा है।मेहनतकश छत्तीसगढ़ या नशे का अड्डा?
छत्तीसगढ़ को हमेशा “कमाऊ, खाऊ अऊ लाद के सूतो” वाली मेहनती संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है।
लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है।
मेहनत की जगह नशा
खेती की जगह अफीम
रोजगार की जगह सट्टा
अगर यही हाल रहा, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य किस दिशा में जाएगा?
जनता पूछ रही है जवाब।
प्रदेश की जनता अब सीधे सवाल कर रही है।
“दारू, सट्टा, गांजा और अफीम से क्या विकास होगा?”
अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर ये सब खुलेआम क्यों चल रहा है?
अब नहीं तो कब?
यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।
अगर अभी भी सरकार और प्रशासन नहीं चेते, तो छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” नहीं, बल्कि नशे का गोदाम बन जाएगा।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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