विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार
छत्तीसगढ़/विशेष खबरें_
छत्तीसगढ़,जिसे कभी “धान का कटोरा” कहकर गर्व से पुकारा जाता था, आज वही ज़मीन सवालों के कटघरे में खड़ी है। छत्तीसगढ़ की उपजाऊ धरती पर अब सिर्फ धान नहीं, बल्कि ज़हर भी उगाया जा रहा है,कभी अफ़ीम,तो अब मक्के की आड़ में गांजा।
फरसगांव में 686 गांजे के पौधे, महासमुंद में तरबूजों के नीचे छिपाकर तस्करी,ये घटनाएं कोई छोटी-मोटी क्राइम रिपोर्ट नहीं हैं। ये संकेत हैं कि ज़मीन के नीचे सिर्फ फसल नहीं, बल्कि अपराध की जड़ें भी गहरी हो चुकी हैं।
सवाल सीधा है, जिम्मेदार कौन?
हर बार जब ऐसी खबर सामने आती है, तो एक पुराना राग छेड़ दिया जाता है।
“ये सब पिछली सरकार की देन है।”
तो क्या अब भी हर गलती के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ही दोष दिया जाएगा?
और अगर ऐसा है, तो फिर वर्तमान में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी क्या सिर्फ दर्शक बनी रहेगी?
सरकारें बदलती हैं,लेकिन अगर जमीन पर हालात नहीं बदलते, तो इसका मतलब साफ है।
या तो इच्छाशक्ति की कमी है, या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत है।
खेती या अपराध का नया मॉडल?
मक्के के खेतों के बीच गांजा उगाना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं हो सकता।यह एक संगठित नेटवर्क का संकेत है,किसान शामिल हैं या मजबूर?
स्थानीय प्रशासन को भनक क्यों नहीं लगी?
क्या यह सब पुलिस की नाक के नीचे नहीं हो रहा?
और महासमुंद में तरबूजों के नीचे गांजा छिपाकर तस्करी
यह बताता है कि अपराधी अब क्रिएटिव नहीं, बल्कि कॉन्फिडेंट हो चुके हैं। सरकार की प्राथमिकता क्या है?
सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं दिखता है।
एक तरफ सरकार शराब दुकानों को व्यवस्थित करने और राजस्व बढ़ाने में व्यस्त है,दूसरी तरफ नशे के अवैध कारोबार की जड़ें फैलती जा रही हैं।
क्या यह विडंबना नहीं है कि सरकार खुद शराब बेच रही है,और दूसरी तरफ नशे के खिलाफ “अभियान” भी चला रही है?
सवाल यह नहीं कि शराब सही है या गलत।
सवाल यह है कि क्या सरकार नशे के खिलाफ ईमानदारी से लड़ भी रही है?
अफ़ीम से गांजा तक – बढ़ता खतरा
कुछ समय पहले अफ़ीम की खेती के बड़े खुलासे हुए थे। कार्रवाई भी हुई।
लेकिन क्या उससे सिस्टम सुधरा?
आज वही कहानी फिर दोहराई जा रही है,बस फसल बदल गई है।
इसका मतलब साफ है।
कार्रवाई होती है, लेकिन जड़ पर वार नहीं होता
नेटवर्क टूटता नहीं, सिर्फ जगह बदलता है,भविष्य पर हमलायह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है।
यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर सीधा हमला है।
जब गांवों में खेती की जगह नशे की फसल उगने लगे,
तो समझ लीजिए कि समस्या सिर्फ अपराध नहीं,
पूरे सामाजिक ढांचे की कमजोरी है।
अब समय आ गया है कि सत्ता में बैठे लोग यह तय करें,क्या वे हर मुद्दे पर “पिछली सरकार” का सहारा लेते रहेंगे?
या फिर ज़मीनी हकीकत को बदलने के लिए ठोस कदम उठाएंगे?क्योंकि जनता अब जवाब चाहती है, बहाना नहीं।
धान के कटोरे को अगर ज़हर का अड्डा बनने से बचाना है,
तो राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं,जमीन पर सर्जिकल स्ट्राइक करनी होगी।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

