विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार

रायपुर/बस्तर/उड़ीसा/विशेष रिपोर्ट _
छत्तीसगढ़ की पवित्र धरती को प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध बनाने वाली और बस्तर की संस्कृति, आस्था व जीवन का आधार मानी जाने वाली इंद्रावती नदी को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बस्तर के संसाधनों को बचाने के बजाय कॉर्पोरेट घरानों के हित साधने में लगी हुई है,जबकि आदिवासियों की जीवनदायिनी इंद्रावती नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता जा रहा है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनावी मंचों से बस्तर के विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि बस्तर की जीवनरेखा कही जाने वाली इंद्रावती नदी के पानी को बचाने और उसका हक दिलाने में सरकार नाकाम साबित हो रही है।
“बस्तर के संसाधन चाहिए, पर बस्तर की चिंता नहीं”
कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा सरकार को बस्तर की जनता से ज्यादा खनिज संपदा और करोड़ों के संसाधनों की चिंता है।
उनका कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में इंद्रावती नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है, लेकिन सरकार को इससे कोई सरोकार नजर नहीं आता।
कांग्रेस नेताओं ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा,“क्या सरकार की प्राथमिकता बस्तर की नदियों और जंगलों को बचाना है, या फिर कॉर्पोरेट घरानों को संसाधन सौंपना?”
ओड़िशा से पानी नहीं ले पा रही सरकार?
इंद्रावती नदी के पानी को लेकर ओड़िशा और छत्तीसगढ़ के बीच वर्षों से विवाद चलता आ रहा है।

कांग्रेस का आरोप है कि छत्तीसगढ़ सरकार इंद्रावती नदी में अपने हिस्से का 50% पानी भी ओड़िशा से नहीं ले पा रही, जबकि दूसरी ओर महानदी के पानी को लेकर विवाद और निरीक्षण जारी है।
इसी संदर्भ में महानदी नदी और केलो नदी के जल बंटवारे को लेकर ट्रिब्यूनल के सदस्य निरीक्षण कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि प्रदेश सरकार अपनी ही नदियों के अधिकार को लेकर मजबूत पैरवी करने में असफल दिख रही है।
“पहले इंद्रावती का हक दिलाओ”
कांग्रेस ने साफ कहा है कि पहले छत्तीसगढ़ को इंद्रावती नदी का 50% हिस्सा दिलाया जाए,उसके बाद ही महानदी के पानी को ओड़िशा को देने पर विचार किया जाए।
उनका कहना है कि बस्तर के लोगों के जीवन से जुड़े इस मुद्दे पर सरकार को तुरंत और ईमानदारी से कदम उठाने चाहिए।
कॉर्पोरेट बनाम प्राकृतिक संसाधन का पुराना विवाद
छत्तीसगढ़ में पिछले कई वर्षों से यह आरोप लगता आ रहा है कि सरकार,चाहे किसी भी दल की रही हों,खनिज और प्राकृतिक संसाधनों को कॉर्पोरेट घरानों को कौड़ियों के मोल सौंपने के आरोपों से घिरी रही हैं।
बस्तर के जंगल, नदियां और जमीन यहां के आदिवासी समाज की पहचान और जीवन का आधार हैं। ऐसे में इंद्रावती नदी को लेकर उठ रहे सवाल अब राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय बहस का बड़ा मुद्दा बनते जा रहे हैं।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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