विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार
छत्तीसगढ़/ विशेष रिपोर्ट_
रसोई गैस की बढ़ती कीमतों और किल्लत के बीच अब ग्रामीण रसोई में एक बार फिर गोबर से बने छेना (कंडे) की धमक तेज हो गई है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि जिस छेना को कभी गरीबों का ईंधन कहा जाता था, वही अब “महंगा ईंधन” बनने की राह पर है।
राजधानी रायपुर सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में एक छेना की कीमत 20 रुपये से बढ़कर 40 रुपये तक पहुंचने की चर्चा है।
वहीं गोबर के कंडों को जमा कर बनाई जाने वाली पूरी “खरही” की कीमत भी 4 हजार रुपये के पार बताई जा रही है।
चूल्हा अभी भी ग्रामीण रसोई का राजा
सरकार भले ही प्रधानमंत्री उज्वला योजना के जरिए गैस कनेक्शन देने का ढिंढोरा पीटती रही हो, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है।
ग्रामीण छत्तीसगढ़ के अधिकांश गरीब परिवार आज भी गैस सिलेंडर भरवाने की क्षमता नहीं रखते।
नतीजा चूल्हा,जलाऊ लकड़ी और गोबर के कंडे
ही उनकी रसोई की असली ताकत बने हुए हैं।
गांवों में मवेशियों के गोबर से कंडे बनाकर उन्हें खरही के रूप में सजाकर सुखाया जाता है, और बाद में इन्हीं कंडों को चूल्हे में जलाकर खाना पकाया जाता है।
मिडिल ईस्ट की जंग का असर गांव की रसोई तक
माना जा रहा है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर अब ग्रामीण ईंधन बाजार तक पहुंचने लगा है।
जब पेट्रोलियम उत्पाद महंगे और दुर्लभ होने लगते हैं,तब ग्रामीण इलाकों में गोबर के कंडे की मांग अचानक बढ़ जाती है।
यही कारण है कि इन दिनों कंडों की मांग बढ़ रही है,कीमतें चढ़ रही हैं।और कई गांवों में छेना अब “कमोडिटी” की तरह बिकने लगा है।
बड़ा सवाल
अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में गरीब की रसोई का अंतिम सहारा,गोबर का कंडा,भी महंगा हो जाएगा।
यानी जिस देश में गैस सिलेंडर आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है, वहां अब चूल्हे का ईंधन भी “महंगाई की आग” में झुलसने लगा है।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

