आर एस एस (RSS)पर अमेरिकी शिकंजा कसने की सिफारिश,मोदी के ‘वैचारिक घर’ पर अंतरराष्ट्रीय सवाल।

विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार

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संयुक्त राज्य अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग।(USCIRF )ने ट्रंप सरकार से RSS पर प्रतिबंध, संपत्ति जब्ती और अमेरिका में एंट्री बैन की मांग की,भारत की राजनीति में मचा नया भूचाल
भारत की सियासत में दशकों से प्रभाव रखने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका की सरकारी संस्था  (USCIRF) संयुक्त राज्य अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने अमेरिकी सरकार से सिफारिश की है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के मामलों को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक (RSS) पर कड़े कदम उठाए जाएं।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि RSS से जुड़े व्यक्तियों और संगठनों पर प्रतिबंध लगाया जाए, उनकी संपत्तियों को सीज किया जाए और उनके सदस्यों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाई जाए। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में भारत को विशेष रूप से चिंताजनक देश “ (CPC)” घोषित करने की भी सिफारिश की गई है।
USCIRF का आरोप है कि RSS धार्मिक आधार पर भेदभाव और असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों से जुड़ा रहा है, जो धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकता है।इस सिफारिश ने भारत की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है,क्योंकि यही संगठन वर्तमान सत्ता के वैचारिक आधार के रूप में देखा जाता है।
दरअसल, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत RSS के प्रचारक के रूप में कर चुके हैं। यही संगठन भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक स्तंभ के रूप में भी जाना जाता है। ऐसे में अमेरिका की ओर से इस तरह की सिफारिशें भारतीय राजनीति के लिए असहज सवाल खड़े कर रही हैं।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया था।

उस दौर में भी संगठन की विचारधारा और गतिविधियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे। हालांकि बाद में कुछ शर्तों के साथ यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। विरोधियों का आरोप है कि मनुस्मृति आधारित सामाजिक व्यवस्था की वकालत करने वाला यह संगठन संविधान की मूल भावना के विपरीत विचारधारा को बढ़ावा देता रहा है।

आलोचकों के मुताबिक, यह विचारधारा सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बन सकती है।

दिलचस्प बात यह भी है कि एक ओर भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की कोशिशें चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी संस्थाओं की ऐसी रिपोर्टें रिश्तों में नई असहजता पैदा कर सकती हैं।अब सवाल यह है कि जिस संगठन को भारत में सत्ता के शीर्ष से लेकर जमीनी राजनीति तक ताकत का स्रोत माना जाता है, उसी पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे सवाल क्या आने वाले समय में भारतीय राजनीति को नए विवादों की ओर ले जाएंगे?

राजनीतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले जानकारी की माने तो एपिस्टिन फाइल के चलते देश के प्रधानमंत्री का साख बुरी तरह से गिर चुका है और भारतीय जनता पार्टी एवं रस से जुड़े हुए पदाधिकारी और नेता दुनिया के सबसे बड़े यौन अपराधी अमेरिका के एपस्टिन के फाइलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आने से उनके खिलाफ मुखर बताई जा रहे हैं जिसके चलते कयास यह लगाया जा रहा है कि जबरदस्ती रस के खिलाफ में मुद्दा खड़ा करके प्रधानमंत्री के खिलाफ उठने वाले आवाज को दबाया जा रहा है।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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