जनसमस्या शिविर या प्लास्टिक का मेला? प्रशासन की नाक के नीचे उड़ाया गया पर्यावरण कानून।

विनोद नेताम

बालोद/गुरुर से बड़ी खबर:-
अरमरीकला में खुलेआम बंटे बैन पानी पाउच, मंच पर बैठे अफसरों के सामने ही नियमों की धज्जियां।

गुरूर विकासखंड के ग्राम पंचायत अरमरीकला में आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर अब समाधान से ज्यादा सवालों के घेरे में आ गया है। एक तरफ सरकार और प्रशासन पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करते हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी प्रशासन के कार्यक्रम में खुलेआम प्रतिबंधित प्लास्टिक पानी पाउच परोसे गए,वो भी मंच पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी में।
भीषण गर्मी में आम जनता की सुविधा के नाम पर जो पानी बांटा गया, वह पर्यावरण के लिए जहर साबित होने वाले डिस्पोजल पाउच में था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कार्यक्रम के दौरान एक अधिकारी ने खुद इस पर आपत्ति भी जताई, लेकिन न तो वितरण रुका और न ही किसी जिम्मेदार ने इसे गंभीरता से लिया।
मंच पर तमाम बड़े चेहरे, लेकिन नजर नहीं आई “गड़बड़ी”
कार्यक्रम में दुर्ग संभाग के आयुक्त (राजस्व), बालोद कलेक्टर समेत कई आला अधिकारी मौजूद थे।

जनप्रतिनिधियों की भी पूरी फौज लगी रही,सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक। यहां तक कि क्षेत्र की विधायक संगीता सिन्हा भी मंच पर मौजूद रहीं।
लेकिन सवाल ये है कि जब मंच पर बैठे जिम्मेदारों की नजर आम जनता पर थी, तो क्या उन्हें अपने सामने हो रही इस खुली लापरवाही का एहसास नहीं हुआ?
पर्यावरण के नाम पर दिखावा या सिर्फ भाषणबाजी?
सरकार एक ओर प्लास्टिक बैन की बात करती है, जागरूकता अभियान चलाती है, जुर्माने लगाती है,और दूसरी ओर खुद के आयोजनों में उन्हीं नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं।
क्या पर्यावरण संरक्षण सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित है?
क्या आम जनता के लिए कानून अलग और प्रशासन के लिए अलग?
जनता के पैसों से नियमों की हत्या।
हर सरकारी कार्यक्रम में लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, ताकि व्यवस्थाएं बेहतर हों। लेकिन अरमरीकला का यह दृश्य बताता है कि पैसे तो बहाए जाते हैं, पर जिम्मेदारी गायब है।
सवाल सीधा है।
जब सुप्रीम कोर्ट और सरकार प्लास्टिक पर सख्ती दिखा चुके हैं, तो यह लापरवाही किसके इशारे पर हुई?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
आखिरी सवाल जो गूंज रहा है।
क्या जनसमस्या निवारण शिविर में जनता की समस्याएं हल हुईं या फिर प्रशासन ने खुद एक नई समस्या खड़ी कर दी?
यह मामला अब सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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