विनोद नेताम

छत्तीसगढ़/ बालोद/गुरुर/ विशेष रिपोर्ट_

छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों पूरे प्रदेश में “सुशासन तिहार” के जरिए जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में लगी हुई है। सरकारी मंचों से संवेदनशील प्रशासन, जनता की सुनवाई और समस्याओं के समाधान के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। मगर जब जमीन की हकीकत सामने आती है, तब समझ आता है कि “सुशासन” का यह चमकदार पोस्टर अंदर से कितना खोखला है।

बालोद जिला के गुरुर जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत अरकार में आयोजित सुशासन तिहार इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आया है। जिला प्रशासन बालोद शायद इस आयोजन को अपनी बड़ी सफलता मान रहा होगा,लेकिन सच्चाई यह है कि इस पूरे कार्यक्रम ने प्रशासनिक संवेदनशीलता की पोल खोलकर रख दी।
जिस आयोजन में अफसरों को जनता की तकलीफ समझनी थी, उसी आयोजन में मासूम बच्चों की मेहनत और पसीने पर पूरी व्यवस्था खड़ी दिखाई दी। भीषण गर्मी में छोटे-छोटे बच्चे पानी के भारी डिब्बे उठाकर कार्यक्रम में मौजूद अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों की प्यास बुझाते रहे, जबकि जिम्मेदार अफसर मंचों और कुर्सियों की व्यवस्था में मशगूल रहे।
सवाल यह नहीं है कि बच्चों ने पानी क्यों भरा
सवाल यह है कि जिला प्रशासन बालोद को यह नौबत आने ही क्यों दी ?
क्या प्रशासन के पास इतने कर्मचारी भी नहीं थे कि पानी पिलाने की जिम्मेदारी तय कर सके ?
क्या करोड़ों रुपये के सरकारी आयोजनों में बच्चों का श्रम अब “व्यवस्था” का हिस्सा बन चुका है ?
या फिर प्रशासन को यह भरोसा हो गया है कि गांव के गरीब बच्चों से काम ले लो, कोई आवाज नहीं उठाएगा ?
सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह रही कि कार्यक्रम समाप्त होने तक किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह एहसास तक नहीं हुआ कि जिन बच्चों के दम पर यह आयोजन गर्मी में चल पाया, वे आखिर कौन थे और किन हालात में काम कर रहे थे। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक अहंकार और संवेदनहीनता की जीती-जागती तस्वीर है।
विडंबना देखिए
मंच से “जनसेवा” की बातें होती रहीं और नीचे मासूम बच्चे मजदूरों की तरह दौड़ते रहे। अफसरों के लिए यह शायद एक सामान्य बात रही होगी, मगर समाज के लिए यह बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला है।

जिला प्रशासन बालोद चाहे इसे छोटी चूक बताकर मामला दबाने की कोशिश करे, लेकिन तस्वीरें बहुत कुछ बयान कर चुकी हैं। क्योंकि सच यही है कि जहां बच्चों के कंधों पर सरकारी कार्यक्रम का बोझ टिका हो, वहां “सुशासन” नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता दिखाई देती है।
और शायद अब जिला प्रशासन बालोद को यह समझ लेना चाहिए कि जनता तालियों से ज्यादा तस्वीरों पर भरोसा करती है और अरकार की तस्वीरें प्रशासन को आईना दिखाने के लिए काफी हैं।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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