विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार
छत्तीसगढ़/विशेष रिपोर्ट_
छत्तीसगढ़ में जो तस्वीर उभर रही है, वह सिर्फ चिंताजनक नहीं बल्कि डरावनी है। दंतेवाड़ा-बीजापुर के जंगलों से आई यह खबर सत्ता के उस “सुशासन मॉडल” की पोल खोल रही है, जिसका ढोल लगातार पीटा जा रहा है।
बाघ और तेंदुए की खाल तस्करी के इस बड़े नेटवर्क में डिप्टी रेंजर तक की संलिप्तता,यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि सिस्टम के अंदर तक घुस चुके सड़ांध का सबूत है।
जिनके कंधों पर वन और वन्यजीवों की रक्षा की जिम्मेदारी थी, वही शिकारी गिरोह का हिस्सा बन बैठे,इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
सोचिए, जब जंगल का पहरेदार ही शिकारी बन जाए, तो बाघ-तेंदुए कैसे बचेंगे?
और यह कोई एक मामला नहीं है।
एक तरफ पुलिसकर्मी नशे की तस्करी में पकड़े जा रहे हैं।
दूसरी तरफ प्रशासनिक अफसरों पर गंभीर आरोप लग रहे हैं।
और अब वन विभाग के अधिकारी तस्करी में शामिल पाए जा रहे हैं।
तो सवाल सीधा है,क्या छत्तीसगढ़ में कानून सिर्फ आम आदमी के लिए ही बचा है?
क्या सत्ता के संरक्षण में “सिस्टम” खुद अपराध का अड्डा बनता जा रहा है?
सरकार “डबल इंजन” और “सुशासन” की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। आम जनता के मन में भरोसे की जगह अब संदेह घर करता जा रहा है।
कार्रवाई जरूर हुई, गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन क्या इतना काफी है?
या फिर यह सिर्फ उस बड़े नेटवर्क का छोटा सा सिरा है, जिसकी जड़ें सत्ता और सिस्टम की गहराइयों तक फैली हैं?
आज जरूरत सिर्फ बयानबाजी की नहीं, बल्कि
सिस्टम की सख्त सफाई की है
जिम्मेदारों पर उदाहरणीय कार्रवाई की है,और सबसे जरूरी,जनता का भरोसा वापस जीतने की है
वरना वो दिन दूर नहीं, जब लोग यह कहने लगेंगे
“छत्तीसगढ़ में अब कानून नहीं, संपर्क चलता है,और जंगल में अब शिकारी नहीं, अफसर घूमते हैं।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

