तेल सस्ता लेकिन जनता का खून महँगा।मोदी सरकार की तेल नीति ने आम आदमी की जेब को बना दिया एटीएम।

विनोद नेताम

विशेष रिपोर्ट

बहुत हुई महँगाई की मार अच्छे दिन आने वाले है 2014 के चुनाव में यही नारे लगाकर सत्ता तक पहुँची भाजपा सरकार आज उसी जनता को पेट्रोल-डीज़ल के दामों से कुचलने में लगी हुई है।
जिस जनता ने बदलाव की उम्मीद में वोट दिया था, आज वही जनता पेट्रोल पंप पर खड़े होकर अपने ही फैसले पर माथा पीट रही है।
PIB के अधिकृत आंकड़े खुद चीख-चीखकर सच बता रहे हैं कि जब 26 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला, तब भारतीय बास्केट का कच्चा तेल लगभग 108 डॉलर प्रति बैरल था।
उस समय पेट्रोल करीब ₹71 और डीज़ल लगभग ₹56 प्रति लीटर मिल रहा था,लेकिन आज कच्चे तेल की कीमत पहले से कम होने के बावजूद पेट्रोल ₹105 के पार और डीज़ल भी आम आदमी की कमर तोड़ने वाला हथियार बन चुका है।
अब सवाल उठता है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हुआ, तो देश में पेट्रोल-डीज़ल महँगा क्यों हुआ?
इस सवाल का जवाब सरकार कभी साफ़-साफ़ नहीं देती, क्योंकि सच सामने आते ही “जनसेवा” का नकाब उतर जाएगा।
टैक्स के नाम पर जनता की जेब पर डकैती
मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल को जनता की जरूरत नहीं, कमाई का जरिया बना दिया।
एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत घटती रही, दूसरी तरफ केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और टैक्स बढ़ाकर जनता से मोटी वसूली करती रही।
यानी खेल सीधा था कच्चा तेल सस्ता हुआ लेकिन टैक्स बढ़ा दिया गया,फायदा जनता को नहीं, सरकार के खजाने को मिला।
सरकार कहती रही कि देश विकास कर रहा है,लेकिन असलियत यह है कि जनता के जेब से पैसा निकालकर सरकारी खजाने को मोटा किया गया।
“डबल इंजन” का मतलब  डबल वसूली?
आज हालत यह है कि गरीब आदमी बाइक में पेट्रोल भरवाने से पहले दस बार सोचता है।
मजदूर काम पर जाने से डरता है।
किसान ट्रैक्टर चलाने से पहले हिसाब लगाता है।
ट्रक चालक किराया बढ़ाता है।
और फिर उसी का असर सब्ज़ी, राशन, दाल, दूध और हर जरूरी सामान पर पड़ता है।
यानी पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई सिर्फ पंप तक सीमित नहीं रहती यह हर घर की रसोई तक आग पहुंचाती है।
लेकिन सत्ता में बैठे लोग वातानुकूलित कमरों में बैठकर जनता को “विश्वगुरु” बनने का सपना दिखाते रहते हैं।
सरकार की प्राथमिकता जनता नहीं, मुनाफ़ा?
तेल कंपनियों ने रिकॉर्ड मुनाफ़ा कमाया।
सरकार ने रिकॉर्ड टैक्स वसूला।
लेकिन जनता को क्या मिला?
महँगाई
बेरोजगारी
महँगा परिवहन
महँगा राशन
महँगी खेती
और टूटी हुई कमर
जिस देश में डीज़ल महँगा होगा, वहाँ किसान कैसे बचेगा?
जहाँ पेट्रोल आम आदमी की पहुँच से बाहर होगा, वहाँ रोजगार कैसे बढ़ेगा?लेकिन इन सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार चुनावी प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट में व्यस्त दिखाई देती है।
“अमृतकाल” या “वसूलीकाल”?
सरकार आज देश को “अमृतकाल” बता रही है,
लेकिन आम आदमी पूछ रहा है।
“अगर यही अमृतकाल है,
तो ज़हर किसे कहते हैं?”
क्योंकि जनता को आज हर मोड़ पर टैक्स देना पड़ रहा है।
कमाई कम हो रही है,लेकिन खर्च आसमान छू रहा है।
गरीब की थाली से लेकर किसान के खेत तक असर
डीज़ल महँगा होने का मतलब है।
खेत की जुताई महँगी
फसल की सिंचाई महँगी
मंडी तक परिवहन महँगा
बाजार में सब्ज़ी महँगी
और अंत में गरीब की थाली खाली यानी तेल की मार सिर्फ गाड़ी चलाने वालों पर नहीं,
बल्कि हर नागरिक पर पड़ती है।जनता पूछ रही है,जब कच्चा तेल सस्ता हुआ तो राहत क्यों नहीं मिली?
सरकार टैक्स कम क्यों नहीं करती?
जनता से वसूले गए लाखों करोड़ रुपए कहाँ गए?
क्या पेट्रोल-डीज़ल सिर्फ सरकार की कमाई का साधन बन चुका है?
देश की जनता अब नारों से नहीं, हिसाब से जवाब चाहती है।
क्योंकि पेट्रोल-डीज़ल की आग ने आम आदमी की जिंदगी को झुलसा दिया है।और अब जनता पूछ रही है देश चल रहा हैं।या जनता की जेब निचोड़ने का कारोबार?कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद पेट्रोल-डीज़ल महँगा रखना सिर्फ आर्थिक नीति नहीं,
बल्कि आम जनता पर आर्थिक अत्याचार जैसा महसूस होने लगा है।

By Amit Mandavi

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

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