विनोद नेताम वरिष्ठ पत्रकार
छत्तीसगढ़/बालोद/सनौद/विशेष रिपोर्ट_
सनौद खरीदी केंद्र से फिर उठे सवाल पुराने घोटालों की छाया में नई खरीदी, किसान डरे या भरोसा करें?
छत्तीसगढ़ की पहचान “धान के कटोरा” के रूप में भले ही देश-दुनिया में स्थापित हो चुकी हो, लेकिन इस पहचान के पीछे छुपी है मेहनतकश किसानों की वह कहानी, जो हर मौसम में अपनी किस्मत खेतों में बोते हैं।
सावन-भादो में धान, तो रबी में चना, मसूर, सरसों और गेहूं उगाकर अन्नदाता इस मिट्टी को सोना बनाते हैं।
लेकिन अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस सोने की सही कीमत दे पाने में सक्षम है या फिर वही पुराना ढर्रा,घोषणाएं बड़ी, ज़मीन पर व्यवस्था फिसड्डी?
सरकार का फैसला,राहत या जोखिम?
प्रदेश सरकार ने किसानों के हित में चना खरीदी को भी धान खरीदी केंद्रों से जोड़ने का निर्णय लिया है। पहली नजर में यह फैसला किसान हितैषी और दूरदर्शी प्रतीत होता है।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
किसानों के मन में एक ही सवाल गूंज रहा है,जो सिस्टम धान नहीं संभाल पाया, वो चना कैसे संभालेगा?
सनौद केंद्र विवादों की पुरानी फाइल फिर खुली
बालोद जिले का सनौद धान खरीदी केंद्र पहले ही विवादों का अड्डा बन चुका है।
कुछ महीने पहले यहां पदस्थ प्राधिकृत अधिकारी नंदकुमार साहू के कारनामों ने व्यवस्था की पोल खोल दी थी।
अब वही केंद्र चना खरीदी का पहला पड़ाव बना दिया गया है।
यानी,पुरानी गड़बड़ियों पर नई जिम्मेदारी का बोझ।
किसानों में डर का माहौल
खेती में दिन-रात एक कर चना उगाने वाले किसान अब बेचने से पहले ही चिंतित हैं।
बारिश, तूफान और मौसम की मार झेलकर तैयार की गई फसल को लेकर किसान अब सिस्टम से डर रहे हैं, न कि बाजार से।
कई किसान अब सरकारी केंद्र की बजाय कोचियों (बिचौलियों) की तलाश में भटक रहे हैं।
वजह साफ है,कम दाम सही, लेकिन पैसा तो पक्का मिलेगा। सिस्टम पर सीधा सवाल
क्या सरकार ने सिर्फ घोषणा कर जिम्मेदारी पूरी कर ली?
क्या खरीदी केंद्रों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की गई?
क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हुई या सिर्फ फाइलों में लीपापोती?
अगर जवाब “नहीं” है, तो चना खरीदी सिर्फ एक और प्रयोग बनकर रह जाएगी।
राजनीतिक कटाक्ष: घोषणा बनाम हकीकत
सरकारें अक्सर किसानों के नाम पर फैसले लेकर वाहवाही लूटती हैं, लेकिन असली परीक्षा खेत से मंडी तक की यात्रा में होती है।
धान खरीदी में लड़खड़ाया सिस्टम अब चना खरीदी में दौड़ेगा,यह दावा कम और मज़ाक ज्यादा लगता है।
अगर सुधार नहीं हुआ, तो यह योजना भी
किसानों की उम्मीदों पर सरकारी बुलडोजर” साबित हो सकती है।
“मिट्टी सोना उगाती है”लेकिन सिस्टम भरोसा नहीं उगा पा रहा।

अमित कुमार मंडावी बालोद, छत्तीसगढ़ आधारित अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे जमीनी स्तर की सटीक रिपोर्टिंग और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते हैं। वर्तमान में वे Chhattisgarhjunction.in के माध्यम से अपराध, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और जनहित से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

